शिक्षा विकास का आधार है, किंतु विकास का स्वरूप क्या हो ? यह भी स्पष्ट रहना चाहिए। विकास का चरम लक्ष्य है -नैतिकता। इसका प्रारंभ होता है - 'स्वावलंबी' और 'पुरुषार्थ की क्षमता की वृद्धि से। पुरुषार्थ के बिना तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता और विकास यदि स्वयं द्वारा न किया जाए, वरन दूसरों के द्वारा थोपा जाए, तो इसे विकास मानने को ही बुद्धिमान लोग तैयार नहीं होंगे।
Education is the basis of development, but what is the nature of development? This should also be clear. The ultimate goal of development is morality. It starts with the increase of 'self-reliance' and 'purushartha' capacity. Without effort, existence itself would be in danger and if development is not done by oneself, but is imposed by others, then intelligent people will not be ready to accept it as development.
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महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने महान ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के नवें समुल्लास में स्वर्ग की परिभाषा देते हुए कहा है कि सुख विशेष का नाम स्वर्ग और दुःख विशेष का नाम नरक होता है। स्वः नाम सुख का होता है। स्वः सुखं गच्छति यस्मिन् स स्वर्गः अतो विपरीतो दुःखभोगो नरक इति। जो सांसारिक सुख है वह सामान्य स्वर्ग और जो परमेश्वर...